ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 10
पाठ का परिचय (Introduction):
'दो कलाकार' मन्नू भंडारी द्वारा रचित एक अत्यंत भावपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण कहानी है। यह कहानी 'सच्ची कला' और 'सच्चे कलाकार' की परिभाषा को स्पष्ट करती है। कहानी में दो सहेलियाँ हैं—एक चित्रकार (चित्रा) जो कैनवास पर रंग भरती है, और दूसरी समाज-सेविका (अरुणा) जो लोगों के दुःख बाँटकर उनके जीवन में रंग भरती है। अंत में कहानी सिद्ध करती है कि मानवता की सेवा (Poverty/Humanity) ही सबसे बड़ी और अमर कला है।
कहानी की शुरुआत लड़कियों के एक हॉस्टल से होती है जहाँ चित्रा और अरुणा नाम की दो सहेलियाँ एक ही कमरे में रहती हैं। चित्रा एक चित्रकार है और उसे अपने चित्रों का बहुत शौक (पेशा) है। दूसरी ओर, अरुणा अपना सारा समय गरीब और लाचार बच्चों को पढ़ाने और समाज सेवा में लगाती है। चित्रा हमेशा अरुणा को ताना मारती है कि वह अपनी ज़िंदगी व्यर्थ कर रही है और अपने पिता का पैसा भी बर्बाद कर रही है।
एक दिन चित्रा को पता चला कि उसे आगे की चित्रकारी की पढ़ाई के लिए विदेश (Paris) जाना है। विदेश जाने से कुछ दिन पहले, एक भिखारिन जो हॉस्टल के बाहर भीख माँगती थी, एक पेड़ के नीचे मर जाती है। उसके दो छोटे बच्चे अपनी मरी हुई माँ के शरीर से चिपक कर बुरी तरह रो रहे थे।
जब चित्रा ने यह दृश्य देखा, तो एक साधारण इंसान की तरह उसे बच्चों पर दया नहीं आई। उसकी कलाकार की नज़र ने उस दृश्य में एक 'मास्टरपीस पेंटिंग' खोज ली। उसने रुककर उस मृत भिखारिन और रोते हुए बच्चों का एक स्केच (Sketch) बनाया और वापस आ गई।
कुछ देर बाद जब अरुणा को भिखारिन के मरने की खबर मिली, तो वह तुरंत उन अनाथ बच्चों की मदद करने के लिए दौड़ पड़ी। चित्रा के विदेश जाने का दिन आ गया। अरुणा उसे स्टेशन छोड़ने भी नहीं आ सकी क्योंकि वह उन्हीं अनाथ बच्चों के व्यवस्था में व्यस्त थी। चित्रा विदेश (पेरिस) चली गई।
विदेश में चित्रा ने उसी 'मृत भिखारिन और रोते हुए बच्चों' वाली पेंटिंग को पूरा किया और उसका नाम रखा "अनाथ"। यह पेंटिंग इतनी शानदार बनी कि इसने दुनिया भर की कला प्रदर्शनियों (Exhibitions) में प्रथम पुरस्कार जीते। चित्रा अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्ध चित्रकार बन गई।
तीन साल बाद चित्रा भारत लौटी। दिल्ली में उसकी पेंटिंग्स की एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी लगी थी। वहाँ चित्रा की मुलाक़ात अपनी पुरानी सहेली अरुणा से हुई। अरुणा के साथ दो बहुत ही सुंदर, साफ-सुथरे और अच्छी तरह तैयार किए गए बच्चे थे।
चित्रा ने गर्व से अरुणा को अपनी वही प्रसिद्ध "अनाथ" वाली पेंटिंग दिखाई और कहा कि इसी पेंटिंग ने मुझे दुनिया भर में शोहरत (Fame) दिलाई। तब अरुणा ने उन दोनों बच्चों को आगे किया और कहा, "चित्रा, ये वही दो बच्चे हैं जिन्हें तुमने कैनवास (Canvas) पर उतारा था। मैंने इन्हें गोद ले लिया है और अपने जीवन के कैनवास पर उतारा है।"
यह सुनकर चित्रा अवाक् (हैरान) रह गई। कुछ क्षणों के लिए वह भी समझ गई कि उसने तो केवल निर्जीव रंगों से एक चित्र बनाया था, लेकिन अरुणा ने दो अनाथ बच्चों को एक नया जीवन देकर जो कला दिखाई है, वह दुनिया की सबसे बड़ी और 'सच्ची कला' है।
प्रसंग: यह वाकया अरुणा ने चित्रा को तब कहा जब चित्रा हमेशा कैनवास पर रंग भरने में उलझी रहती थी और समाज सेवा का मज़ाक उड़ाती थी।
व्याख्या: यह पंक्ति कहानी के मूल संदेश को प्रकट करती है। अरुणा का मानना है कि ईश्वर ने यदि हमें धन, सामर्थ्य और साधन दिए हैं, तो उसका उपयोग लाचार और गरीब लोगों के जीवन को सँवारने (ज़िंदगी बनाने) में करना चाहिए, न कि केवल अपने स्वार्थ या शौक (कागज़ पर निर्जीव चित्र बनाने) के लिए।
प्रसंग: कहानी का अंतिम भाग, जब तीन साल बाद दोनों सहेलियाँ मिलती हैं और अरुणा उन दो अनाथ बच्चों से चित्रा को मिलवाती है।
व्याख्या: यह कहानी का 'क्लाइमेक्स' (Climax) है जो कहानी के शीर्षक 'दो कलाकार' को सार्थकता प्रदान करता है। एक कलाकार (चित्रा) ने बच्चों की दुर्दशा को कागज़ पर उकेर कर नाम कमाया, जबकि दूसरी कलाकार (अरुणा) ने बिना किसी स्वार्थ और प्रसिद्धि के उन बच्चों को नया जीवन देकर मानवता की अमर कला रची। चित्रा को अहसास होता है कि अरुणा ही असली मायनों में उससे भी बड़ी कलाकार है।
प्रश्न 1: भिखारिन की मृत्यु पर चित्रा और अरुणा की प्रतिक्रिया (Reaction) में क्या अंतर था?
उत्तर: भिखारिन की मृत्यु पर दोनों सहेलियों की प्रतिक्रिया उनके स्वभाव
के अनुसार बिल्कुल अलग थी। चित्रा (चित्रकार) को मृत भिखारिन और उसके रोते हुए बच्चों पर
दया नहीं आई। उसमें संवेदना (Empathy) की कमी थी। उसने उस दुखद दृश्य में केवल अपनी पेंटिंग का एक शानदार
विषय (Subject) खोजा और उनका स्केच बनाकर चली गई।
इसके विपरीत, अरुणा (समाज सेविका) को जैसे ही यह खबर मिली, वह करुणा से भर गई। वह तुरंत उन
अनाथ बच्चों की मदद करने के लिए दौड़ पड़ी। यहाँ तक कि वह बच्चों की व्यवस्था करने के कारण विदेश जा रही
अपनी सबसे अच्छी सहेली (चित्रा) को स्टेशन छोड़ने भी नहीं जा सकी।
प्रश्न 2: 'दो कलाकार' कहानी का शीर्षक कितना सार्थक है? दोनों कलाकारों में क्या अंतर है?
उत्तर: 'दो कलाकार' कहानी का शीर्षक पूरी तरह से सार्थक है। इस कहानी में दो अलग-अलग प्रकार की कलाओं का चित्रण किया गया है। चित्रा एक भौतिक कलाकार है जो रंगों के माध्यम से कैनवास पर निर्जीव चित्र उकेरती है और दुनियावी प्रसिद्धि (Fame) चाहती है। इसके विपरीत, अरुणा एक आत्मिक कलाकार (सच्चे मायनों में मानवता की कलाकार) है, जो निर्जीव कागज़ के बजाय जीवित इंसानों (गरीबों और अनाथों) की ज़िंदगी में खुशी के रंग भरती है। अंततः कहानी अरुणा को ही श्रेष्ठ और 'बड़ी कलाकार' सिद्ध करती है।